Tuesday, September 20, 2011

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी


क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी ?

मैं दुखी जब-जब हुआ, संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा, रीति दोनो ने निभाई,

किंतु इस आभार का अब हो उठा है बोझ भारी;

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी ?
क्या करूं ?

एक भी उच्छवास मेरा, हो सका किस दिन तुम्हारा ?
उस नयन से बह सकी कब, इस नयन की अश्रु-धारा ?

सत्य को मूंदे रहेगी, शब्द की कब तक पिटारी ?

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी ?
क्या करूं ?

कौन है जो दूसरे को, दुःख अपना दे सकेगा ?
कौन है जो दूसरे से, दुःख उसका ले सकेगा ?

क्यों हमारे बीच धोखे, का रहे व्यापार जारी ?

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी ?
क्या करूं ?

क्यों न हम लें मान, हम हैं, चल रहे ऎसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला, दुःख नही बांटते परस्पर,

दूसरों की वेदना में, वेदना जो है दिखाता,
बेदना से मुक्ति का निज, हर्ष केवल वह छिपाता,

तुम दुःखी हो तो सुखी मै, विश्व का अभिशाप भारी !

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी ?
क्या करूं ?

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

यह चाँद उदित होकर नभ में, कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरा लहरा यह शाखाएँ, कुछ शोक भुला देती मन का,

कल मुर्झानेवाली कलियाँ, हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से, संदेश सुनाती यौवन का,

तुम देकर मदिरा के प्याले, मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का, उपचार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

जग में रस की नदियाँ बहती,
रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिल सी झाँकी, नयनों के आगे आती है,

स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं, यह वायु उड़ा ले जाती है;

ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, ये साधन भी छिन जाएँगे;
तब मानव की चेतनता का, आधार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पाएँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थ बना कितना हमको,

कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता, है ज्ञात किसे, जितनी हमको?

कह तो सकते हैं, कहकर ही, कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का, अधिकार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

कुछ भी न किया था जब उसका, उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर, जो रो-रोकर हमने ढोए;

महलों के सपनों के भीतर, जर्जर खँडहर का सत्य भरा,
उर में ऐसी हलचल भर दी, दो रात न हम सुख से सोए;

अब तो हम अपने जीवन भर, उस क्रूर कठिन को कोस चुके;
उस पार नियति का मानव से, व्यवहार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

संसृति के जीवन में, सुभगे, ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे, तम के अन्दर छिप जाएँगी,

जब निज प्रियतम का शव, रजनी, तम की चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी, कितने दिन खैर मनाएगी!

जब इस लंबे-चौड़े जग का, अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब हम दोनो का नन्हा-सा, संसार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

ऐसा चिर पतझड़ आएगा, कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गा गा, जीवन की ज्योति जगाएगी,

अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर, ‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन, करने के हेतु न आएगी,

जब इतनी रसमय ध्वनियों का, अवसान, प्रिये, हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का, उद्गार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन, निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’, सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,

वह गायक-नायक सिन्धु कहीं, चुप हो छिप जाना चाहेगा,
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे, गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;

संगीत सजीव हुआ जिनमें, जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का, जड़ तार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

उतरे इन आखों के आगे, जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली, सुकुमार लताओं के गहने,

दो दिन में खींची जाएगी, ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा, पाएगा कितने दिन रहने;

जब मूर्तिमती सत्ताओं की, शोभा-सुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का, श्रृंगार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई, हम सब को खींच बुलाता है;

मैं आज चला तुम आओगी, कल, परसों सब संगीसाथी,
दुनिया रोती-धोती रहती, जिसको जाना है, जाता है;

मेरा तो होता मन डगडग, तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा, मँझधार, न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

Saturday, December 11, 2010

अँधेरे का दीपक

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था,

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ?

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली,
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ?

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना,
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ?

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर,
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा,
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ?

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए,
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ?

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका,
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ?

Monday, April 19, 2010

Main Tujhse Preet Laga Baitha

Tu chahe chanchalta keh le, Tu chahe durbalta keh le,
Dil ne jyun hi majboor kiya, Main tujhse preet laga baitha.

Yeh pyar diye ka tel nahin, Do char ghadi ka khel nahin,
Yeh to kripaan ki dhara hai, Koi gudiyon ka khel nahin.
Tu chahe nadani keh le, Tu chahe manmani keh le,
Maine jo bhi rekha khinchi, Teri tasveer bana baitha.

Main chatak hun tu badal hai, Main lochan hun tu kajal hai,
Main ansu hun tu anchal hai, Main pyasa tu gangajal hai,
Tu chahe diwana keh le, Ya alhad mastana keh le,
Jisne mera parichay poocha, Main tera naam bata baitha.

Saara madiralay ghoom gaya, Pyale pyale ko choom gaya,
Par jab tune ghoonghat khola, Main bina piye hi jhoom gaya.
Tu chahe pagalpan keh le, tu chahe to poojan keh le,
Mandir ke jab bhi dwar khule main teri alakh jaga baitha.

Main ab tak jaan na paaya hoon, Kyun tujhse milne aaya hoon,
Tu mere dil ki dhadkan main, main tere darpan ki chhaya hoon,
Tu chahe to rogi keh le, Ya matwala jogi keh le,
Main tujhe yaad karte karte, apna bhi hosh ganwa baitha...

Thursday, May 28, 2009

Wo Najuk si ladki

Kahin aik masoom nazuk si larki
Bohat Khubsurat magar sanwli si
Mujhay apnay khwabon ki bahon main pa kay
Kabhi neend main muskurati to hogi
Usi neend main kasmasa kasmasa kar
Sirhanay se Takiye girati to hogi

Wohi Khwab din ki mundairon pe akay
Usay man hi man main lubhatay to hongay
Kaee saaz seenay ki khamoshion main
Meri yaad se jhanjhanatay to hongay
Wo besakhta dheemay dheemay suron main
meri dhun main kuch gungunatee to hogi

Chalo Khat likhain jee main ata to hoga
Magar ungliyan kanpkapaati to hongeen
Qalam Haath se choot jata to hoga
Umangain qalam phir uthati to hongi
Mera naam apni kitabon pe likh kar
Wo daanton main ungli dabati to hogi

Zuban se kabhi uff nikalti to hogi
badan dheeme dheeme dehakta to hoga
Kanhi ke kanhi paon partay to hongay
Badan pe dupatta latakta to hoga
Kabhi subh ko sham kehti to hogi
Kabhi rat ko din batati to hogi

Kahin ek masoom nazuk si larki
Bohat Khubsurat magar sanwli si
Mujhay apnay khwabon ki bahon main pa kay
Kabhi neend main muskurati to hogi

Koi Deewana Kehta Hai

Koi deewana kehta hai, koi pagal samajhta hai

Magar dharti  ki baichaini ko bas badal samajhta hai,

Main tujhse door kaisa hoon, tu mujhse door kaisi hai,

Ye tera dil samajhta hai ya mera dil samajhta hai.........

—-

Mohabbat ek ehsaason ki pawan si kahani hai,

Kabhi kabira diwana tha kabhi meera diwani hai

Yahan sab log kehta hain meri aankhon main aansoon hain,

Jo tu samjhe to moti hain, jo naa samjhe to paani hai....

—-

Samundar peer ka andar hai lekin ro nahin sakta,

Ye ansoon pyaar ka moti hai isko kho nahin sakta....

Meri chahat ko dulhan tu bana lena magar sun le,

Jo mera ho nahin paaya, wo tera ho nahin sakta........

—-

Swayam se door ho tum bhi, swayam se door hain hum bhi...

Bade mashhoor ho tum bhi bade mashhoor hain hum bhi,

Bade magroor ho tum bhi bade magroor hain hum bhi.....

atah majboor ho tum bhi atah majboor hain hum bhi...........

—-

Bhramar koi kumudani par machal baitha to hungama,

Humare dil main koi khwaab pal baitha to hungama.

Bade hi gaur se sunate hain sab kisse muhabbat ke...

Main kisse ko haqeeqat main badal baitha to hungama...


Sirf Itna Kaha Hai

Sirf Itna hi kaha hai, pyar hai tumse;
Jajbaaton ki kabhi Numaish nahin ki..........

Pyar ke badle sirf pyaar manga hai;
Rishtey ki to koi guzaarish nahin ki............

Chaho to bhula dena humein dil se;
Sada yaad rakhnein ki sifarish nahin ki...........

Khamoshi se toofan seh lete hai jo;
Un baadlon ne Ijhaar ki baarish nahin ki............

Tumhein hi maana hai rehnuma apna;
Aur to kisi cheez ki khwahish nahin ki...............